मैं कवि हूँ शायद ही पहले मैं स्वीकारता। स्वीकार तो मैं अब भी नहीं करूंगा पर फिर भी शंका तो हो ही गयी है। बात शायद कुछ रासायनिक परिवर्तनों की हो या हिंदी साहित्य के अध्यन की या शायद फिर दबा कर रखी गयी भावुकता के सर उठाने की, पर अगर वाक्यों में वक्रता कविता है तो शायद मेरी रचनाएँ भी कविता के आस पास कहीं होंगी ऐसा मैं मान सकता हूँ। खैर, बेहतर होगा कि इस ब्लॉग कि शुरुआत अपनी एक छोटी सी पंक्ति से करून और इस का फैसला अपने मित्रों पर छोड़ दूं -
मुझे गर्व है -
तुमपर, जिसने पीड़ा को चुना है
सृजन कि पीड़ा को
उस पीड़ा को जो मांग करती है बदलाव की,
और आरम्भ करती है एक नए बदलाव की
और जो निश्चय ही बेहतर है उस सुख से जो निश्चल है,
जो नए रास्तों की तलास पर रोक लगाती है।
अपने मित्रों के प्रत्युतर के इंतजार में।मुझे गर्व है -
तुमपर, जिसने पीड़ा को चुना है
सृजन कि पीड़ा को
उस पीड़ा को जो मांग करती है बदलाव की,
और आरम्भ करती है एक नए बदलाव की
और जो निश्चय ही बेहतर है उस सुख से जो निश्चल है,
जो नए रास्तों की तलास पर रोक लगाती है।